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औरंगाबाद सदर: एनडीए टिकट के लिए सियासी कुश्ती

Published On: September 7, 2025
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Aurangabad Bihar News: 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव (assembly elections) की अभी सुगबुगाहट भी शुरू नहीं हुई है, लेकिन औरंगाबाद सदर सीट पर अभी से ही ज़बरदस्त सियासी घमासान शुरू हो गया है। यहाँ सिर्फ़ टिकट की होड़ नहीं है; यह एक पूरी तरह से ‘कुश्ती’ है! एनडीए का यह पारंपरिक गढ़ अब एक चहल-पहल वाले अखाड़े में तब्दील हो गया है, जहाँ दावेदार टिकट पाने के लिए ऐसे होड़ लगा रहे हैं मानो वह किसी मेले में मुफ़्त का टोकन हो। हर नेता अपनी राजनीतिक ताकत दिखा रहा है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि एनडीए का चैंपियन कौन बनेगा?

हार का साया, जीत की उम्मीद

पिछले दो चुनावों (2015 और 2020) में हार का स्वाद चखने के बाद, औरंगाबाद (Aurangabad) सदर NDA के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। 2025 का चुनाव गठबंधन के लिए करो या मरो की लड़ाई है, लेकिन जीत की राह बिल्कुल भी आसान नहीं है। हर उम्मीदवार खुद को बाजी पलटने की कुंजी मानता है, और अपनी दावेदारी पेश करने के लिए दिल्ली और पटना के दरवाज़े खटखटा रहा है।

भीड़भाड़ वाला अखाड़ा: कौन है सबसे बड़ा दावेदार?

औरंगाबाद सदर का राजनीतिक अखाड़ा दावेदारों से भरा है, और हर कोई अपनी-अपनी ताकत लेकर मैदान में उतर रहा है:

  • रामाधार सिंह
  • सुशील कुमार सिंह
  • गोपाल शरण सिंह
  • अनिल कुमार सिंह
  • राजन सिंह
  • प्रवीण सिंह
  • सतीश कुमार सिंह
  • हरेंद्र कुमार सिंह
  • मुकेश कुमार सिंह

टिकट की होड़ ने इस मुकाबले को एक राजनीतिक महायुद्ध में बदल दिया है, जिसमें एनडीए खेमे के भीतर ही गठबंधन और प्रतिद्वंद्विताएँ उभर रही हैं।

एक सीट, कई सपने: कौन चलाएगा ट्रेन?

औरंगाबाद सदर की स्थिति एक “आकांक्षा एक्सप्रेस” ट्रेन जैसी है जो चलने के लिए तैयार है, लेकिन कोई नहीं जानता कि इंजन कौन होगा और डिब्बे कौन होंगे। हर दावेदार खुद को प्रेरक शक्ति बताता है, टिकट के लिए सीटी बजाने को आतुर। यह दौड़ कम और एक राजनीतिक ‘महाभारत’ ज़्यादा है, जिसमें सहयोगी एक-दूसरे के खिलाफ रणनीतियों के जटिल जाल में षडयंत्र रच रहे हैं।

इस राजनीतिक (Political)  कुश्ती का सबसे मनोरंजक पहलू यह है कि दावेदार अभी विपक्ष पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहे हैं, बल्कि आपस में ही उलझे हुए हैं। कुछ लोग अपनी जातिगत पकड़ पर भरोसा कर रहे हैं, तो कुछ पार्टी में अपने योगदान का बखान कर रहे हैं। इस बीच, दर्शक दीर्घा में बैठे मतदाता इस तमाशे को देख रहे हैं और सोच रहे हैं कि टिकट पाने में इतने मशगूल ये नेता जीतने के बाद उनके मुद्दों की भी परवाह करेंगे या नहीं।

एनडीए की दुविधा: आगे एक कठिन फैसला

फिलहाल, औरंगाबाद सदर (Aurangabad Sadar) में एनडीए की नाव मझधार में फंसी हुई है, जहाँ कई खेवनहार नियंत्रण के लिए होड़ में हैं। ऐसे सही ‘पहलवान’ का चुनाव करना जो न केवल इस अंदरूनी लड़ाई को जीत सके, बल्कि चुनावी अखाड़े (Electoral arenas) में पार्टी को जीत की ओर भी ले जा सके, पार्टी आलाकमान के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। एक बात तो साफ़ है—औरंगाबाद सदर अब सिर्फ़ टिकट की दौड़ नहीं रह गया है; यह पूरी तरह से एक राजनीतिक कुश्ती है.

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